अपने आदर्श की तरह विराट कोहली की भी कप्तानी से छुटटी हुई !

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विडंबना अगर भारतीय क्रिकेट में देखनी हो तो विराट कोहली के वनडे क्रिकेट से कप्तानी छिनने के ताज़ा अध्याय को देखें. वो कोहली जो आक्रामक कप्तान के तौर पर सौरव गांगुली को अपना आदर्श मानते थे. जो गांगुली की ही तरह बीसीसीआई में हमेशा अपना दबदबा बरकरार रखना चाहते थे. जो गांगुली की ही तरह खिलाड़ियों के बीच लोकप्रिय तो थे, लेकिन एक खेमे को नाराज़ भी रखते थे और गांगुली की ही तरह हिंदी और अंग्रेज़ी में मीडिया के सामने अपनी भावनाओं का इज़हार भी शानदार तरीके से करते थे. उसी कोहली की विंडबना तो देखिये कि 2005 में जिस तरह से गागुंली को कप्तानी से हटाया गया था, ठीक उसके 15 साल बाद कोहली को भी हटाया गया. उस वक्त भी साफ-साफ बोर्ड अधिकारी ये कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाये थे कि तब तक भारत के सबसे कामयाब कप्तान रह चुके गांगुली को भविष्य के कप्तान राहुल द्रविड़ के लिए हटाया गया.

विडंबना की भरमार है कोहली की विदाई में!

विडंबना एक बार फिर से देखिये. एक बार फिर से कोहली के इस फैसले में गांगुली- द्रविड़ का जिक्र हो रहा है! गांगुली बीसीसीआई के मौजूदा अध्यक्ष है तो द्रविड़ कोच. इस बार रोहित शर्मा की अगुवाई में भारतीय क्रिकेट के बेहतर भविष्य की उम्मीद देखी जा रही है. अब दिलचस्प देखना ये होगा कि शर्मा अपने मौजूदा कोच द्रविड़ की तरह हताश होकर कप्तानी तो नहीं छोड़ेंगे जैसा कि द्रविड़ ने 2007 में किया था. जब उन्हें ये महसूस हुआ कि वो ड्रेसिंग रुम का तनाव और इसकी राजनीति बर्दाश्त करने में नाकाम हो रहे थे.

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भारतीय क्रिकेट में कप्तानों को यादगार विदाई कहां मिलती है

जिस दिन से कोहली ने सोशल मीडिया पर खुद को टेस्ट और वनडे क्रिकेट का कप्तान घोषित कर दिया और टी20 के लिए रोहित शर्मा का नाम सुझाया. उसी दिन से उनकी कप्तानी जाने की उल्टी गिनती की शुरुआत हो गई. बीसीसीआई के आला अधिकारियों को कभी भी एक बड़े खिलाड़ी की देश में तूती बोलती भाती नहीं और इसके लिए आपको कपिल देव, सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर के युग में जाना पड़ेगा. कपिल देव को 1983 वर्ल्ड कप जीतने के ठीक 1 साल बाद हटा दिया. वहीं, गावस्कर ने 1985 में वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप जीतने के बाद खुद से ही कप्तानी को अलविदा कह दिया, क्योंकि उन्हें पता था कि भारतीय क्रिकेट में कप्तानों को यादगार विदाई कहां मिलती है.

मर्जी से कप्तानी छोड़ने की बात हकीकत से बहुत परे

कोहली को शायद ऐसा लगा होगा कि वो जनता को ये संदेश दे रहे हैं कि कि वो अपनी मर्जी से कप्तानी छोड़ रहें है, लेकिन हकीकत तो इससे बहुत परे थी. ये बात इंग्लैंड दौरे पर न्यूज़ीलैंड के खिलाफ़ वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल में हार के बाद ही शुरु हो चुकी थी. लेकिन हैरानी की बात है कि कोहली इस संदेश को बार बार अनदेखा करने की कोशिश कर रहे थे. जब कोहली को टी20 वर्ल्ड कप से पहले ये अल्टीमेटम दे दिया कि अगर वो ट्रॉफी नहीं जीतते है तो कप्तानी हर हाल में छिन ली जाएगी तो कोहली ने बीच का रास्ता निकाला और टूर्नामेंट से पहले ही टी20 फॉर्मेट से कप्तानी छोड़ने की घोषणा कर डाली. बोर्ड के अधिकारियों को इससे काफी नाराज़गी हुई, जिन्हें ये लगा कि कोहली अब भी ये सोच रहे थे कि बीसीसीआई गांगुली और जय शाह नहीं बल्कि विनोद राय जैसा उनका फैन चला रहा था.

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वनडे क्रिकेट में बादशाहत पर कैसे सवाल उठाए जा सकते

कोहली को शायद ऐसा लगा कि वनडे क्रिकेट में उन्होंने सिर्फ 3 बड़े टूर्नामेंट में कप्तानी की थी और वो एकदम से निकम्मे साबित नहीं हुए थे. 2017 चैंपियंस ट्रॉफी में अगर टीम इंडिया फाइनल में हारी तो 2019 वर्ल्ड कप में सेमीफाइनल में हार से पहले तक वो सबसे मज़बूत टीम दिख रहे थे. हां, 2020 टी20 वर्ल्ड कप का खेल सबसे निराशाजनक रहा था लेकिन फिर भी वनडे क्रिकेट में कोहली की बादशाहत पर कैसे सवाल उठाए जा सकते थे. जब क्योंकि 2017 में फुल टाइम कप्तान बनने के बाद 17 दिवपक्षीय सीरीज़ में भारत ने 13 सीरीज़ जीती और सिर्फ 4 हारे. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ 2019 में वो इकलौती घरेलू सीरीज़ वनडे क्रिकेट में हारे और ऐसे में जबकि 2023 का वर्ल्ड कप भारत में ही होना है तो कोहली से बेहतर विकल्प और कोई तो हो नहीं सकता था.

महान कप्तान जीत फीसदी से नहीं वर्ल्ड, कप ट्रॉफी से तय होते हैं.

कोहली को उनके समर्थकों ने भी कहा कि 95 वनडे मैचों में 65 जीत और सिर्फ 27 हार का रिकॉर्ड ना उन्हें सिर्फ भारतीय इतिहास का सबसे कामयाब बनाता है बल्कि सर्वकालीन महान कप्तानों में वो जीत फीसदी के लिहाज से हैंसी क्रोन्ये, रिकी पोंटिंग और क्लाइव लॉयड से ही पीछे थे. लेकिन कोहली शायद भूल गये कि क्रोन्ये को इतिहास महान कप्तानों में याद नहीं करता है, क्योंकि उनके पास एक वर्ल्ड कप नहीं है वहीं लॉयड और पोटिंग लाजवाब है क्योंकि उन्होंने वर्ल्ड कप जीता है.

आज शायद गांगुली ने कोहली की परवाह नहीं की क्योंकि कभी कोहली ने गांगुली को हल्के में लिया था.कुल मिलाकर देखा जाए तो शायद ये कहा जा सकता है कि कोहली जैसा विराट खिलाड़ी के साथ बीसीसीआई का रवैया और सलीका ना सिर्फ बेहद गैर पेशेवर रहा है बल्कि सम्मान नहीं देने वाला भी रहा है. ख़ासकर ये देखते हुए कि बोर्ड के अध्यक्ष खुद गांगुली हैं जो इस तरह के कड़े अनुभव को अतीत में झेल चुके हैं. लेकिनए हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि इसी गांगुली ने 2017 में कोहली के आगे काफी मिन्नतें की थी कि अनिल कुंबले जैसे दिग्गज को अपमानित करके कोच के पद से नहीं हटाया जाए. तब कोहली ने गांगुली की नहीं सुनी थी और आज शायद गांगुली ने कोहली की परवाह नहीं की. दूसरी बात ये भी है कोहली को जब से ये संकेत बार.बार मिल रहे थे कि उनको कप्तान के तौर पर अब ना तो बोर्ड और ना खिलाड़ियों का पूरा समर्थन हासिल है तो नेताओं की तरह हर हाल में कुर्सी से चिपकने की ऐसी नासमझी वाली ज़िद पर क्यों अड़े रहे. इसका नतीजा तो वही होना था जो अब हुआ, जिससे भारतीय क्रिकेट के हर चाहने वाले को मायूसी हुई हो.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

ब्लॉगर के बारे में

विमल कुमार

न्यूज़18 इंडिया के पूर्व स्पोर्ट्स एडिटर विमल कुमार करीब 2 दशक से खेल पत्रकारिता में हैं. Social media(Twitter,Facebook,Instagram) पर @Vimalwa के तौर पर सक्रिय रहने वाले विमल 4 क्रिकेट वर्ल्ड कप और रियो ओलंपिक्स भी कवर कर चुके हैं.

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